Friday, 25 March 2016

शिक्षाप्रद कहानी : घर बना मंदिर...


एक समय की बात है, मगध के व्यापारी को में बहुत लाभ हुआ, अपार धन-संपत्ति पाकर उसका मन अहंकार से भर गया। उसके बाद से वह अपने अधीनस्थों से अहंकारपूर्ण व्यवहार करने लगा। 



इतना प्रबल था कि उसको देखते हुए उसके परिवार वाले भी अहंकार के वशीभूत हो गए। किंतु जब सभी के अहंकार आपस में टकराने लगे तो घर का वातावरण नरक की तरह हो गया।
वह व्यापारी दुःखी होकर एक दिन भगवान बुद्ध के पास पहुंचा और याचना करके बोला - भगवन्! मुझे इस नरक से मुक्ति दिलाइए। मैं भी भिक्षु बनना चाहता हूं।
भगवान बुद्ध ने गंभीर स्वर में कहा- अभी तुम्हारे भिक्षु बनने का समय नहीं आया है। बुद्ध ने कहा- भिक्षु को पलायनवादी नहीं होना चाहिए। जैसे व्यवहार की अपेक्षा तुम दूसरों से करते हो, स्वयं भी दूसरों के प्रति वैसा ही व्यवहार करो। ऐसा करने से तुम्हारा घर भी  मंदिर बन जाएगा।
घर जाकर उस व्यापारी ने भगवान को अपनाया और घर का वातावरण स्वतः बदल गया। अब सब अपने-अपने अहंकार को भूलकर एक-दूसरे के साथ प्रेम से रहने लगे। शीघ्र ही घर के दूषित वातावरण में नया उल्लास छा गया। 
सीख : दूसरों के साथ आप ऐसा व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसंद नहीं। अहंकार से हमेशा दूर रहने में ही इंसान की भलाई है। ...read more

रंगबिरंगी चटपटी कहानी : होली पर अमृत वर्षा


पिताजी को होली पर इस बार बच्चों, किशोरों और युवकों पर कुछ ज्यादा ही प्यार आ रहा था, इसीलिए हमारे इलाके की नई पीढ़ी को बुलाकर उन्होंने कहा था- 'भई ! इस बार होली जरा धूमधाम से मने।' और उन्होंने इसके लिए अच्छी आर्थिक मदद भी दी ताकि लाउडस्पीकर वगैरा का इंतजाम हो सके और कार्यक्रम के बाद छोटे डिब्बों में चार-चार लड्डू भी बांटे जाएं।  
बात दरअसल यह थी कि होली के बाद चुनाव के पर्चे भरे जाने थे। नेताजी को टिकट मिलने वाला था। इन दिनों वह महसूस कर रहे थे कि अब युवा शक्ति का जमाना है। चुनाव जीतना है तो बच्चों की उंगली पकड़कर चलने में ही भलाई है। बूढ़ी पीढ़ी को अब आराम करने दो। 
होलिका दहन की तैयारी, इलाके की चौक में पूरी हो चुकी थी। अगली सुबह रंग गुलाल का कार्यक्रम भी यहीं होने वाला था। अपने कुछ युवा समर्थकों के साथ नेताजी आए। होलिका दहन हुआ। फिर उनका भाषण हुआ। अंत में उन्होंने कहा- 'मैं आप सबको होली की बधाई देता हूं। मैं क्षमा चाहूंगा कि कल सुबह मैं रंग खेलने के लिए पहले उपस्थित न हो सकूंगा। 



कारण यह है कि सुबह मुख्यमंत्री निवास पर होली होगी और इस मौके के लिए मैंने जो खास सफेद कुर्ता-पायजामा सिलवाया है, उस पर मैं चाहता हूं कि पहली पिचकारी का रंग माननीय मुख्यमंत्री जी ही डालें।' नेताजी के यह कहने पर 'नो..नो' की आवाजें आने लगीं। 
इलाके के एक पुराने नेता ने आकर माइक पर हाथ रखा और नेताजी से बोले- 'यह क्या अनर्थ कर रहे हैं ! जिनसे आपको वोट लेना है उनकी उपेक्षा कर, आप मुख्यमंत्री के यहां पहले जाएंगे ? इसका क्या अंजाम होगा, आपने सोचा है ? read more