रंगबिरंगी चटपटी कहानी : होली पर अमृत वर्षा
पिताजी को होली पर इस बार बच्चों, किशोरों और युवकों पर कुछ ज्यादा ही प्यार आ रहा था, इसीलिए हमारे इलाके की नई पीढ़ी को बुलाकर उन्होंने कहा था- 'भई ! इस बार होली जरा धूमधाम से मने।' और उन्होंने इसके लिए अच्छी आर्थिक मदद भी दी ताकि लाउडस्पीकर वगैरा का इंतजाम हो सके और कार्यक्रम के बाद छोटे डिब्बों में चार-चार लड्डू भी बांटे जाएं।
बात दरअसल यह थी कि होली के बाद चुनाव के पर्चे भरे जाने थे। नेताजी को टिकट मिलने वाला था। इन दिनों वह महसूस कर रहे थे कि अब युवा शक्ति का जमाना है। चुनाव जीतना है तो बच्चों की उंगली पकड़कर चलने में ही भलाई है। बूढ़ी पीढ़ी को अब आराम करने दो।
होलिका दहन की तैयारी, इलाके की चौक में पूरी हो चुकी थी। अगली सुबह रंग गुलाल का कार्यक्रम भी यहीं होने वाला था। अपने कुछ युवा समर्थकों के साथ नेताजी आए। होलिका दहन हुआ। फिर उनका भाषण हुआ। अंत में उन्होंने कहा- 'मैं आप सबको होली की बधाई देता हूं। मैं क्षमा चाहूंगा कि कल सुबह मैं रंग खेलने के लिए पहले उपस्थित न हो सकूंगा।
कारण यह है कि सुबह मुख्यमंत्री निवास पर होली होगी और इस मौके के लिए मैंने जो खास सफेद कुर्ता-पायजामा सिलवाया है, उस पर मैं चाहता हूं कि पहली पिचकारी का रंग माननीय मुख्यमंत्री जी ही डालें।' नेताजी के यह कहने पर 'नो..नो' की आवाजें आने लगीं।
इलाके के एक पुराने नेता ने आकर माइक पर हाथ रखा और नेताजी से बोले- 'यह क्या अनर्थ कर रहे हैं ! जिनसे आपको वोट लेना है उनकी उपेक्षा कर, आप मुख्यमंत्री के यहां पहले जाएंगे ? इसका क्या अंजाम होगा, आपने सोचा है ? read more
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